GUTSCHEIN
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"मुझे बोलना नहीं आता" उन लोगों की किताब है जो चुप इसलिए नहीं रहते क्योंकि उनके पास कहने को कुछ नहीं, बल्कि इसलिए कि हर बात आसानी से कही नहीं जा सकती। यह कविता-संग्रह प्रेरणा को उत्साह नहीं, अनुशासन मानता है। भक्ति को पलायन नहीं, जिम्मेदारी का स्मरण समझता है। और समाज पर तंज मनोरंजन नहीं, उस चुप्पी पर सवाल है जो अक्सर सहमति बन जाती है। यह पुस्तक सुकून नहीं, ईमानदार आत्मसंघर्ष की मांग करती है।
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